॥ इतिहास एवं लीला ॥

इतिहास एवं पौराणिक कथा

द्वापर युग से आज तक — धाम की अमर कथा

पौराणिक काल: श्री कृष्ण की बाल-लीलाएं

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, जब कंस के अत्याचार गोकुल में बढ़ने लगे, तब नंद महाराज और गोपों ने अपने परिवार व पशुओं की सुरक्षा के लिए गोकुल छोड़कर वृंदावन में बसने का निर्णय लिया।

असुरों का उद्धार

वृंदावन की पावन धरा पर बाल-कृष्ण ने पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, बकासुर, अघासुर, धेनुकासुर और प्रलंबासुर जैसे महाबली राक्षसों का वध किया।

कालिया नाग मर्दन

यमुना जी को विषैले कालिया नाग के प्रकोप से मुक्त कराकर भगवान कृष्ण ने यमुना जल को पुनः अमृततुल्य बनाया।

गोवर्धन लीला

देवराज इंद्र का अहंकार चूर करने के लिए श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठ उंगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत उठाकर संपूर्ण ब्रजवासियों की रक्षा की।

महारास लीला

शरद पूर्णिमा की रात्रि में यमुना तट पर वंशीवट के नीचे श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ दिव्य महारास रचाया — जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का सर्वोच्च प्रतीक।

मध्यकालीन पुनरोद्धार — षड् गोस्वामी

द्वापर युग के बाद कालचक्र के प्रभाव से वृंदावन के प्रमुख लीला-स्थल लुप्त हो गए थे। 1515 ई. में श्रीमन् महाप्रभु चैतन्य ने वृंदावन की यात्रा की और अपने अंतर्ज्ञान से श्री राधा-कृष्ण के गुप्त लीला स्थलों की पहचान की। उनकी प्रेरणा से षड् गोस्वामी — सनातन गोस्वामी, रूप गोस्वामी, जीव गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी और गोपाल भट्ट गोस्वामी ने वृंदावन में रहकर प्राचीन शास्त्रों की रचना की, विग्रहों का प्रकटीकरण किया और प्रमुख मंदिरों की स्थापना की।

सनातन गोस्वामी
रूप गोस्वामी
जीव गोस्वामी
रघुनाथ दास गोस्वामी
रघुनाथ भट्ट गोस्वामी
गोपाल भट्ट गोस्वामी

सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत

वृंदावन 6 प्रमुख भक्ति संप्रदायों का संगम स्थल है — गौड़ीय संप्रदाय, श्री संप्रदाय (रामानुज), निम्बार्क संप्रदाय, पुष्टिमार्ग (वल्लभाचार्य), राधावल्लभ संप्रदाय और हरिदासी संप्रदाय।

रासलीला

भगवान कृष्ण की लीलाओं का नाटकीय व संगीतमय मंचन।

सांझी कला

गोबर, फूलों और रंगों से धरातल व जल पर श्री कृष्ण लीला के चित्र बनाने की प्राचीन ब्रज कला।

समाज गायन

मध्यकालीन पद-साहित्य को ध्रुपद शैली में शास्त्रीय रागों पर मंदिर प्रांगणों में गाने की परंपरा।